माता-पिता के साथ मामूली कहासुनी के बाद मैं असहज महसूस करते हुए घर से निकल गया।
जैसे ही मैंने चर्च में प्रवेश किया, एक महिला वयस्क गर्मजोशी भरी मुस्कान के साथ मेरा अभिवादन किया।
"परमेश्वर आपको आशीष दें!"
अभिवादन के एक शब्द ने ही मेरे दिल को सुकून दिया और मैं कुछ देर के लिए अपने मन में चल रही बुरी भावना को भूल गया।
मैंने भी मुस्कुराते हुए उनका अभिवादन किया।
यह सिर्फ एक छोटा सा शब्द था, लेकिन उस संक्षिप्त अभिवादन में इसका बहुत महत्व था।
मैंने सीखा कि एक माँ के प्यार की भाषा बड़े-बड़े शब्दों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी अभिव्यक्तियों में निहित होती है।
एक छोटी सी शुभकामना से मेरा दिल जैसे ही प्रसन्न हुआ, मुझे भी लगा कि मुझे भी बिना किसी संकोच के उसी तरह का प्यार बांटना चाहिए! 🌸🩷
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